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    Home»Uncategorized»तख्तापलट के बाद अस्थिर बांग्लादेश में हिंदुओं के जान – माल की रक्षा के लिए 1971 जैसा कदम उठा सकता है भारत ?
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    तख्तापलट के बाद अस्थिर बांग्लादेश में हिंदुओं के जान – माल की रक्षा के लिए 1971 जैसा कदम उठा सकता है भारत ?

    nikunjkrb@gmail.comBy nikunjkrb@gmail.com09/08/2024No Comments6 Mins Read
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    तख्तापलट के बाद अस्थिर बांग्लादेश में हिंदुओं के जान – माल की रक्षा के लिए 1971 जैसा कदम उठा सकता है भारत

    बांग्लादेश । बांग्लादेश में आरक्षण विरोधी आंदोलन तो बहाना था। जिस तरह आरक्षण के खत्म होने के बाद भी लगातार बांग्लादेश में हिंदुओं पर हमले हो रहे हैं उससे लगता है कि यह पूरा आंदोलन हिंदुओं के खिलाफ ही शुरू हुआ हो।

    हिंदुओं के घर जलाए जा रहे हैं, हिंदू महिलाओं को उनके घर से उठा लिया जा रहा है, हिंदुओं के व्यापारिक प्रतिष्ठानों में लूट हो रही है, मंदिरों को जलाया जा रहा है. जाहिर है कि भारत इन सब घटनाओं को लेकर चिंतित है. भारत सरकार लगातार बांग्लादेश के अधिकारियों के साथ संपर्क में है. पर जब वहां कोई कानून व्यवस्था ही नहीं है तो अधिकारी क्या सचाई बताएंगे. इस तरह के अधिकारियों से संपर्क मात्र से हिंदुओं के जान-माल की रक्षा नहीं की जा सकती है. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने भी सरकार से कहा है कि वो बांग्लादेश में हिंदुओं की सुरक्षा के लिए कुछ करे. बाबा रामदेव जग्गी वासुदेव जैसे गुरुओं ने भी बांग्लादेश में हिंदुओं पर हो रहे अत्याचार पर चिंता जताई है. क्या अब समय नहीं आ गया है कि भारत वैसी ही हिम्मत और तत्परता दिखाए जैसा 1971 में देश ने दिखाया था? भारत हिंदुओं की रक्षा के लिए क्या कर सकता है?

    बांग्लादेश की सेना हो या खालिदा जिया, सबको है भारत की जरूरत

    इस बात से कोई इनकार नहीं कर सकता कि शेख हसीना भारत के प्रति पूर्ण समर्पित थीं. चीन और अमेरिका के दबाव में भी उन्होंने कोई ऐसा काम नहीं किया जो भारत के हितों के विपरीत जाता. पूर्वोत्तर के आतंकवाद को पस्त करने में भी शेख हसीना ने मोदी सरकार की बहुत मदद की. पूर्वोत्तर के तमाम आतंकी संगठनों के ट्रेनिंग कैंप, जो बांग्लादेश में चल रहे थे, उन्हें खत्म करने में उन्होंने मदद की. कई कुख्यात आतंकियों को भारत को बांग्लादेश ने सौंप कर आतंकवाद पर लगाम लगाने का काम किया. जाहिर है कि अभी कुछ साल अवामी लीग फिर से सत्ता में आने से रही. बीएनपी की खालिदा जिया शुरू से ही पाकिस्तान और अमेरिका समर्थक रही हैं. उनकी पूरी राजनीति भारत विरोध पर टिकी रही है. इसलिए ऐसी उम्मीद की जानी चाहिए की वो भारत विरोधी रणनीति पर ही काम करेंगी. पर अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में कुछ भी असंभव नहीं है. अफगानिस्तान में तालिबान केसत्ता में आने के बाद से ऐसा महसूस किया जा रहा था कि भारत के लिए परेशानी और बढ़ेगी. पर आज भारत अपने पड़ोसियों में सबसे ज्यादा निश्चिंत शायद अफगानिस्तान से ही है. इसी तरह से अगर भविष्य में खालिदा जिया अगर सत्ता में आती हैं तो उनकी भी मजबूरी होगी भारत से रिश्ते सुधारना. अगर सैन्य शासन कंटीन्यू होता है तो उसे भी भारतीय समर्थन की जरूरत होगी. इसलिए हिंदुओं को बचाने के लिए सबसे पहला प्रयास तो वर्तमान में बंग्लादेश में जो भी सत्ता में आए उससे बात करने की होनी चाहिए. अगर फिर भी हिंदुओं के खिलाफ हिंसा नहीं रुकती है तो दूसरे कदमों पर विचार करना चाहिए.

    भारत की बिजली और अन्य मदद पर निर्भर है बांग्लादेश

    भारत का बांग्लादेश में अरबों का निवेश है.दक्षिण एशिया में बांग्लादेश हमारा सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार है. वर्ष 2022-23 के बीच दोनों देशों के बीच का कुल व्यापार 15.93 बिलियन अमेरिकी डालर रहा है. ऊर्जा के क्षेत्र में दोनों देश कई प्रोजेक्ट्स पर संयुक्त रूप से काम कर रहे हैं. बांग्लादेश वर्तमान में 1160 मेगावाट बिजली भारत से आयात कर रहा है. दोनों देशों के बीच भारत-बांग्लादेश मैत्री पाइपलाइन बेहद अहम है. भारत ने पिछले एक दशक में बांग्लादेश को सड़क, रेलवे, बंदरगाहों के निर्माण के लिए हजारों करोड़ रुपये दिए हैं.बांग्लादेश भारत पर बिजली के लिए निर्भर है. भारत के हाथ खींचने से बांग्लादेश के कई प्रोजेक्ट्स रुक सकते हैं. बांग्लादेश पहले से ही चीन का कर्जदार है .चीन का कर्जा इतना बढ़ चुका है कि चीन अब बिना कुछ लिए मदद नहीं करने वाला है. खालिदा जिया हों या सेना कोई भी नहीं चाहेगा कि कर्ज के लिए चीन की ऐसी शर्तों को मानें जो देश के स्वाभिमान के खिलाफ हैं.

    अलगाववादी आंदोलनों को दे सकते हैं हवा

    दक्षिण एशिया की राजनीति को समझने वाले जानते हैं कि किस तरह बांग्लादेश, म्यांमार और भारत के पूर्वी ईसाई बहुल हिस्सों को मिलाकर एक ईसाई देश बनाने की तैयारी चल रही है. बांग्लादेश की पीएम शेख हसीना ने भी एक बार कहा था कि पश्चिमी देशों की योजना है कि ईस्ट तिमोर जैसा एक ईसाई देश बनाया जा सके, जो सीधे उनकी उंगली पर नाच सके. हसीना ने यह भी कहा था कि एक ह्वाइट मेन बांग्लादेश के एक द्वीप पर सैन्य अड्डा बनाने की अनुमति मांग रहा था. समझा जाता है कि उनका इशारा अमेरिका की ओर था. बांग्लादेश में तख्तापलट से भी समझा जा रहा है कि अमेरिकी एजेंसियों का हाथ है.
    भारत को खुलकर इस अलगाववादी आंदोलन को हवा देनी चाहिए. रही बात भारत के हिस्से की तो भारत आर्थिक और सामरिक दोनों तरीकों से इतना ताकतवर हो चुका है कोई भी यहां का स्टेट या समुदाय फटेहाल लोगों के साथ नहीं जाना चाहेगा. भारत को बांग्लादेश में काफी समय से चल रहे बंगभूमि आंदोलन को हवा देना होगा. इस अलगाववादी आंदोलन की कल्पना बांग्लादेशी हिंदुओं के लिए बांग्लादेश में एक अलग बंगाली हिंदू देश बनाने की है. वंगा ऑर्मी एक अलगाववादी हिंदू संगठन है जिसका नेतृत्व कालिदास बैद्य करते हैं. 1971 में भारतीय सेना ने मुक्तिवाहिनी को ट्रेनिंग दी, जो बांग्लादेश को पाकिस्तान से अलग करने में काम आया.

    यूक्रेन में जिस तरह रूसी भाषियों की सुरक्षा हुई, उससे सीख ले सकते हैं

    काउंसिल आफ स्ट्रैटेजिक अफेयर्स से संबद्ध सामरिक विश्लेषक दिव्य कुमार सेतु अपने एक ऑर्टिकल में लिखते हैं कि बांग्लादेश में जिस तरह हिंदुओं पर अत्याचार हो रहे हैं उसकी भयावहता को देखते हुए
    भारत को हिंदू अल्पसंख्यकों की दूरगामी सुरक्षा सुनिश्चित करने की रणनीति पर काम करना होगा. इसके लिए भारत चाहे तो रुस से सीख ले सकता है. यूक्रेन के डोनस्क और लुहांस्क में जिस तरह रूसी भाषियों की सुरक्षा के लिए सुरक्षित क्षेत्र बनाया गया है उसी तरह भारत के निकट बांग्लादेश में हिंदुओं की घनी आबादी वाले क्षेत्र स्थापित किए जाएं. अगर हम यह नहीं कर सके तो बांग्लादेश में घटती हिंदुओं की संख्या को विलुप्त होते देखेंगे. यही नहीं संभवतः उनकी सुरक्षा में हमारे समूचे पूर्वोत्तर के भविष्य की सुरक्षा भी हो सकेगी. सेतु लिखते हैं कि बीएनपी और जमात इस फिराक में हैं कि अवामी लीग का कोई नामोनिशान बांग्लादेश में न बचे.शायद यही कारण है कि वहां योजनाबद्ध तरीके से हिंसा का दौरा लंबा खिंच रहा है. फिलहाल भारत के लिए कोई मुश्किल नहीं है. क्योंकि भारतीय सेना बांग्लादेश से बहुत ताकतवर है. भारत अब परमाणु संपन्न देश भी है. भारत चाहे तो दबाव बनाकार बांग्लादेश के हिंसाग्रस्त इलाकों में फंसे हिंदुओं और अवामी लीग समर्थकों को वहां से निकाल कर भारतीय सीमा के निकट बांग्लादेशी भूमि पर ही राहत शिविरों में लाए.

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