
उसके बाद भगवान कृष्ण ने भी जनता को अपनी जीवनशैली में केन्द्र बिन्दु में रखा। आजादी के पहले की बात करें तो भारत में लोकतंत्र की छाप तो थी, लेकिन भारतवंशी राजा जनता के लिए सबकुछ करते रहे और उसके बाद भारत 200 वर्षों तक गुलाम रहा और तब यहां लोकतंत्र विलुप्त हो गया और जो भी यहां पर शासन किया उसमें सिर्फ जनता का मर्दन हुआ। 200 साल की गुलामी ने आम जनता को त्रस्त कर दिया था और धीरे-धीरे हमारे महापुरूषों के नेतृत्व में जनता जागरूक हुई और देश स्वतंत्र हुआ। स्वतंत्रता के बाद हमारे महापुरूषों ने एक स्वस्थ लोकतंत्र की स्थापना की और एक अक्षुण्ण संविधान का निर्माण हुआ, जिसमें शासन को जनता के द्वारा, जनता के लिए बनाया गया और देखते ही देखते भारत सबसे बड़ा लोकतंत्र होने के साथ-साथ एक स्वस्थ लोकतंत्र बना। धीरे-धीरे स्वस्थ लोकतंत्र में व्यवसायिक राजनीति घुस गई और स्वस्थ लोकतंत्र में भ्रष्टतंत्र जैसा धब्बा शब्द जुड़ गया जो दीमक की तरह भारत की छवि को खराब कर रहा है। देश को लूटने वाले राजनीति में घुस गए और जनता उपेक्षित होने लगी।